जान की कीमत नहीं है !

By | April 8, 2016

15 मार्च 2016 को मैं अपने कुछ बिज़नस के कार्य से इलाहाबाद जा रहा था. मेरे साथ गाड़ी में मेरे कुछ सहयोगी भी थे. हम लोग जी.टी. रोड से जा रहे थे.

घटना जगतपुर रेलवे क्रासिंग के आगे और हनुमानगंज के बीच की है. हम लोग क्रासिंग के आगे लगभग 1 किलोमीटर पहुँचे होंगे कि बीच सड़क में कुछ 40 – 50 लोगों की भीड़ लगी हुई थी. सड़क पर आने जाने वाले साधन बगल से निकल कर जा रहे थे. हमारी गाड़ी भी धीरे-धीरे बगल से निकल रही थी, तब सड़क पर देखा कि एक मोटरसाइकिल पड़ी है और पास में ही एक घायल युवक मरणासन्न स्थिति में पड़ा हुआ था. मैंने तुरंत अपनी गाड़ी एक तरफ खड़ी करवाई और हम सब लोग बाहर निकल कर पूछताछ करने लगे. किसी ने कहा कि एम्बुलेंस को बुलाया गया है और वो दो मिनट में पहुँच रही है. उस घायल के साथ मोटरसाइकिल पर एक लड़की और एक युवक भी साथ थे और उन दोनों को भी चोट आई थी पर वो शॉक में थे और कुछ बोल नहीं पा रहे थे. इस समय तक इस पूरी भीड़ में से किसी ने भी उस घायल युवक को छुआ तक नहीं था कि वो जी भी रहा है या नहीं.

मैं और मेरे साथियों के ने मिल कर उस घायल युवक को सड़क के एक तरफ किया. उसे कुछ बाहरी चोट नहीं लगी दिख रही थी, कुछ खरोंच हाथ और पैर पर लगी दीख रही थी और उसके पेशाब हो गया था. पर उसकी आँखे पलटी हुई थी और सांस भी पता नहीं चल रही थी कि नहीं. मैंने उसे CPR (अपने मुंह से उसके मुंह में सांस भरना) देने की कोशिश की और लगा कि उसमे शायद थोड़ी सांस थी. एम्बुलेंस का अब तक कोई अतापता नहीं था.

मैंने निर्णय लिया कि इसे तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए – एम्बुलेंस का इंतज़ार करने का कोई फायदा नहीं है. अपनी गाड़ी में पीछे की सीट पर उसे लिटा कर और उसके साथ के दो लोगों सहित मेरे दो सहयोगी पास के अस्पताल उसे ले कर भागे.

मैं और मेरे एक सहयोगी घटना स्थल पर ही रुके रहे. मैंने पुलिस का 100 नंबर मिलाया और घटना की पूरी जानकारी दी. कहा गया की पुलिस तुरंत पहुँच रही है. 5 मिनट इन्तजार करने के बाद मैं एक सज्जन की मोटरसाइकिल से हॉस्पिटल की तरफ गए. वहाँ जाते ही पता चला कि हॉस्पिटल वालों ने उस घायल को भर्ती नहीं किया. कुछ समय तक हॉस्पिटल वालोँ से कहा-सुनी होती रही और इस बीच उस युवक ने दम तोड़ दिया और मर गया.

भारत में जान की कीमत नहीं है ! एक नवयुवक मर गया, वो बच सकता था अगर:

  • जो भीड़ वहाँ जुटी थी घटनास्थल पर – वो केवल तमाशा देख रहे थे. अगर समय पर उसे हॉस्पिटल ले जाया गया होता तो निश्चितरूप से उसकी जान बच सकती थी.
  • अगर पुलिस और एम्बुलेंस समय से आ जाते तो भी वह नवयुवक बच जाता
  • जब हम उसे हॉस्पिटल ले कर गए – अगर हॉस्पिटल ने उसे भर्ति कर लिया होता तब भी वो बच जाता शायद

 

आप लोग जरा विचार जरूर कीजियेगा – जान से बढ़ कर क्या है? कुछ भी नहीं !

सरकार और समाज का सबसे पहला काम है नागरिकों की जान बचाना.

4 thoughts on “जान की कीमत नहीं है !

  1. Prasant Dubey

    It was heart breaking incidence sir , I go weak on knees when I come to remember that.

    Reply

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